सुसंगति के लाभ निबंध | Susangati Ke Labh Nibandh [ Class 9, 10, 11, 12 ]

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प्रिय पाठक! Allhindi के इस नए लेख में आप सभी का स्वागत हैं। आज की इस लेख में हम सुसंगति के लाभ निबंध को पढेंगे। इसके पिछले लेखो में भी हमने बहुत सारे निबंध लिखे हैं। आइये आज की इस निबंध की शुरुआत करते हैं।

सुसंगति के लाभ निबंध |  Susangati Ke Labh Nibandh

प्रस्तावना:

यह संसार गुण व दोष दोनों से भरा पड़ा है। विवेकी व्यक्ति सदैव गुणग्राही होता है और दोषों को त्याग देता है, लेकिन मूर्ख व्यक्ति गुणों को छोड़ दोष ग्रहण करता है। इस प्रकार सारे मनुष्य गुण व दोषों से भरे पड़े हैं। मनुष्य पर गुण व दोषों का प्रभाव संगति से पड़ता है।

सज्जनों की संगति में गुण व दुर्जनों की संगति में दोष ही दोष मिलते हैं। संगति का चर-अचर सभी जीवों पर परस्पर प्रभाव पड़ता है। हवा भी गर्मी व ठण्ड की संगति पाकर वैसी ही बन जाती है अर्थात् हम जिसकी संगति में रहते हैं, उसका हम पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। मानव समाज में सज्जन लोगों की संगति को सत्संगति कहते हैं और दुर्जन लोगों की संगति को कुसंगति ।

सज्जन के लक्षण

सभी विद्वान् व धर्म ग्रन्थ सज्जनों की संगति करने को कहते हैं। इसलिए हमें जानना चाहिए कि सज्जनों की क्या पहचान है अर्थात् संसार में सज्जन व दुर्जन में क्या अन्तर है? सज्जन लोग ज्ञान के भण्डार होते हैं।वे सदैव दूसरे के हित में लगे रहते हैं। अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए सदैव परिश्रमपूर्वक सद्कार्यों में जुटे रहते हैं।

वे स्वयं सत्य बोलते हैं और अपने निकट आने वाले में भी सत्य का संचार करते हैं। सज्जन लोगों का हृदय अत्यन्त कोमल होता है। वे दया की मूर्ति होते हैं। वे दूसरों के दुःख में दुःखी व दूसरों के सुख में सुखी होते हैं। दूसरों की सहायता करने में उनका जीवन संलग्न रहता है। इसके विपरीत दुर्जन लोगों को दूसरों का अहित करने में आनन्द आता है। वे दूसरों के दुःख को देखकर खुश होते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, जलन, क्रोध, छल और कपट उनके प्रमुख गुण होते हैं।

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सज्जनों की संगति के लाभ

सज्जनों की संगति से मनुष्य के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है बड़े-बड़े चोर डाकू भी सत्संगति में आकर सन्त बन जाते हैं। रत्नाकर डाकू वाल्मीकि बन गए। अँगुलीमाल डाकू बुद्ध के सम्पर्क में आकर एक सन्त बन गए। इस प्रकार के कई उदाहरण मिलते हैं जो सत्संगति पाकर एकदम बदल गए। बड़े-बड़े अपराधी आज भी सज्जन लोगों की संगति में आकर अपनी अपराध वृत्ति को त्याग देते हैं। तुलसीदास जी ने कहा है

“सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई ।। ” सज्जनों की संगति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी संगति में आने वाले जन को अपने समान ही महान् बना देते हैं। जिनमें सारे अच्छे गुण सज्जन व्यक्ति होते हैं। होते हैं, वे

विद्यालयों में परिश्रमी, लगनशील, विनम्र व मृदुभाषी बालक सज्जन होते हैं। ऐसे बालक सदैव उन्नति की चरम सीमा को स्पर्श करते हैं। ऐसे छात्रों की जो संगति करता है वह भी उन्हीं की तरह महान् बन जाता विद्यालय में भी हर प्रकार के छात्र होते हैं, उन सबमें परस्पर संगति का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। सज्जन विद्यार्थी सदैव अच्छे अंकों में पास होते हैं और विद्यालय में सबके प्रिय बने रहते हैं।

उपसंहार

प्रत्येक व्यक्ति को अपने हित की बात सोचनी चाहिए। हित हमेशा सत्संगति में होता है। अच्छी संगति में जाकर दुर्जन व्यक्ति भी अच्छा बन जाता है, जबकि दुर्जन की संगति में यदि गलती से कोई सज्जन व्यक्ति आ जाता है तो सज्जन व्यक्ति भी फँस जाता है। चोरों के बीच में एक ईमानदार व्यक्ति को भी सब चोर ही कहेंगे तथा ईमानदारों के बीच में चोर भी ईमानदार ही कहलाता है। इसलिए कहा है

“संगति कीजै साधु की, हरे और की व्याधि।
संगति बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि ।। “


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