संधि किसे कहते हैं | संधि की परिभाषा, भेद और उदाहरण

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नमस्कार दोस्तों, Allhindi.co.in के इस नए लेख में आपका स्वागत हैं। आज की इस लेख में में आप संधि किसे कहते हैं ? परिभाषा, भेद तथा उदाहरण से जानेंगे| आज की इस विडियो में हम इसी की बात करेंगे और संधि के बारे में विचारपूर्वक समझेंगे।

संधि किसे कहते हैं

संधि की परिभाषा: दो वर्णों या पदों के परस्पर सार्थक मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे संधि कहते हैं।संधि का शाब्दिक अर्थ होता है- समझौता या मेल (जोड़)। अर्थात दो वर्णों या अक्षरों को जोड़ना। उदाहरण: धर्म + अर्थ = धर्मार्थ

संधि किसे कहते हैं

संधि करने के मूल कारण या संधि की आवश्यकता:- संधि करने का मूल कारण है- भाषा-प्रवाह। अर्थात जब दो शब्द या पद अत्यंत निकट होते हैं तो उनके उच्चारण की दृष्टि से उन्हें सहजता प्रदान करने हेतु पहले शब्द के अंतिम अक्षर को तथा दूसरे शब्द के प्रथम अक्षर से मिला दिया जाता है, जिससे एक नए शब्द की उत्पत्ति होती है।

संधि-विच्छेद किसे कहते हैं

संधि-विच्छेद:- संधि का अर्थ है- ‘मेल’ और’ विच्छेद’ का अर्थ है- ‘अलग होना’। दो वर्णों के मिलने से जो एक शब्द बनता है, उस शब्द को तोड़कर अलग-अलग पहले की तरह लिखने की क्रिया को संधि-विच्छेद कहते हैं।
उदाहरण: रमेश =  रमा + ईश
सूर्योदय = सूर्य + उदय

संधि के भेद:

संधि के तीन भेद हैं-

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

स्वर संधि किसे कहते हैं

स्वर संधि की परिभाषा: जब किन्ही दो स्वरों के आपस में मिलने पर जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें स्वर संधि कहते हैं।जैसे: देव + आलय = देवालय (अ + आ = आ )
पर + उपकार = परोपकार (अ + उ = ओ)

स्वर संधि के कितने भेद हैं :-स्वर संधि के निम्न 5 भेद होते हैं-

  1. दीर्घ संधि
  2. गुण संधि
  3. वृद्धि संधि
  4. यण संधि
  5. अयादि संधि

(क) दीर्घ संधि: हिंदी में स्वर दो प्रकार के होते हैं- हस्व; जैसे- अ, इ, उ, ऋ और दीर्घ जैसे आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ औ। हस्व या दीर्घ अ, इ, उ परस्पर निकट आ जाएँ तो दोनों के मेल से दीर्घ ‘आ’ ‘ई’ ‘ऊ” हो जाते हैं। इसे दीर्घ संधि कहते हैं।उदाहरण:- (a) अ + अ = आ
दीप + अवली = दीपावली
पीत + अंबर = पीतांबर

अ + आ = आ
पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
प्रधान + आचार्य = प्रधानाचार्य

आ + अ = आ
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
रेखा + अंकित = रेखांकित

आ + आ = आ
विद्या + आलय = विद्यालय
प्रतीक्षा + आलय = प्रतीक्षालय

(b) इ + इ = ई
गिरि + इंद्र = गिरींद्र
कवि + इंद्र = कवींद्र

इ + ई = ई
कपि + ईश = कपीश
मुनि + ईस = मुनीश

ई + इ = ई
नारी + इच्छा = नारीछा
मही + इंद्र = महीन्द्र

ई + ई = ई
नदी + ईस = नदीश
रजनी + ईश = रजनीश

(c) उ + उ = ऊ
लघु + उत्तम = लघूत्तम
भानु + उदय = भानूदय

उ + ऊ = ऊ
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि

ऊ + उ = ऊ
वधू + उत्सव = वधूत्सव
वधू + उल्लेख = वधूल्लेख

ऊ + ऊ = ऊ
भू + ऊर्जा = भूर्जा

गुण संधि किसे कहते हैं

गुण संधि की परिभाषा: ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’ या ‘ऋ’ के आने पर ‘इ’, ‘ई’ के स्थान पर ‘ए’, ‘उ’, ‘ऊ’ के स्थान पर ‘ओ’ तथा ‘ऋ’ के स्थान पर ‘अर्’ हो जाता है। इसे गुण संधि कहते हैं।

उदाहरण:- (a) अ + इ = ए
नर + इंद्र = नरेंद्र

अ + ई = ए
नर + ईश = नरेश

आ + इ = ए
महा + इंद्र = महेंद्र

आ + ई = ए
रमा + ईश = रमेश

(b) अ + उ = ओ
सूर्य + उदय = सूर्योदय

अ + ऊ = ओ
सूर्य + ऊष्मा = सूर्योष्मा

आ +उ = ओ
महा + उदय = महोदय

आ + ऊ = ओ
गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि

अ + ऋ = अर
देव + ऋषि = देवर्षि

आ + ऋ = अर्
महा + ऋषि = महर्षि

वृद्धि संधि किसे कहते हैं

वृद्धि संधि की परिभाषा: ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’, ‘औ’ के आने पर ‘ए’, ‘ऐ’ के स्थान पर ‘ऐ’ तथा ‘ओ’ ‘औ’ के स्थान पर’ औ’ हो जाता है। इसे वृद्धि संधि कहते हैं।
उदाहरण:- (a) अ + ए = ऐ
हर + एक = हरैक

अ + ऐ = ऐ
मत + ऐक्य = मतैक्य

आ + ए = ऐ
सदा + एव = सदैव

आ + ऐ = ऐ
परम + ऐश्वर्य = परमैश्वर्य

(b) अ + ओ = औ
परम + ओजस्वी = परमौजस्वी

अ + औ = औ
वन + औषधि = वनौषधि

आ + ओ = औ
महा + ओज = महौज

आ + औ = औ
महा + औषध = महौषध

यण संधि किसे कहते हैं

यण संधि:- हस्व या दीर्घ ‘इ’, ‘उ’, ‘ऋ’ के बाद कोई असमान स्वर आने पर ‘इ’ के स्थान पर ‘य्’, ‘उ’ के स्थान पर ‘व्’ तथा ‘ऋ’ के स्थान पर ‘र्’ हो जाता है। इसे यण संधि कहते है।

उदाहरण:- (a) इ/ई + अन्य स्वर = य

अति + अधिक = अत्यधिक
अति + अंत = अत्यंत
अभि + उत्थान = अभ्युत्थान
प्रति + एक = प्रत्येक

(b) उ/ऊ + अन्य स्वर = व

सु + अच्छ = स्वच्छ
अनु + अय = अन्वय
सु + आगत = स्वागत
अनु + एषण = अन्वेषण

(c) ऋ + अन्य स्वर = र्
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
पितृ + आदेश = पित्रादेश

अयादि संधि किसे कहते हैं

अयादि संधि: यदि ‘ए’. ‘ऐ’. ‘ओ’, ‘औ’ के बाद कोई असमान स्वर आने पर ‘ए’ के स्थान पर ‘अय्’. ‘ऐ’ के स्थान पर ‘आय्’, ‘ओ’ के स्थान पर ‘अव्’ तथा ‘औ’ के स्थान पर ‘आव्’ हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।

व्यंजन संधि किसे कहते हैं

व्यंजन संधि की परिभाषा: स्वर तथा व्यंजन अथवा व्यंजन तथा व्यंजन वर्णों के परस्पर मेल को, व्यंजन संधि कहते हैं।
उदाहरण:- (a) वर्ग के प्रथम वर्ण का तृतीय वर्ण में परिवर्तन:- 

क् का ग् 
दिक् + अंबर = दिगंबर

च् का ज्
अच् + अंत = अजंत

ट् का ड्
षट् + आनन = षडानन

त् का द्
जगत् + ईश = जगदीश

प् का ब्
कप् + अंध = कबंध

वर्ग के प्रथम वर्ण का पंचम वर्ण में परिवर्तन:-

क् का ङ्
वाक् + मय = वाङ्मय

ट् का ण्
पट् + मास = षण्मास

त् का न्
जगत् + नाथ = जगन्नाथ

प् का म्
अप् + मय = अम्मय

यदि त् वर्ण के बाद कोई स्वर या ‘ग्’, ‘घ्’, ‘द्’, ‘ध्’, ‘ब्’, ‘भ्’ तथा  ‘य्’, ‘र्’ आये तो ‘त्’ के स्थान पर ‘द्’ हो जाता है।
उदाहरण:- सत् + आनंद = सदानंद
उत् + गम = उद्गम
उत् + दंड = उदंड

उत् + भव = उद्भव

त् के परिवर्तन के नियम:- 

त् + च = च्च
उत्  + चारण = उच्चारण

त् + छ = च्छ
उत्  + छिन्न = उच्छिन्न

त् + ज = ज्ज
सत् + जन = सज्जन

त् + ट = टट्ट
वृहत् + टीका = वृहट्टीका

त् + ड = ड्ड
उत् + डयन = उड्डयन

त् + ल = ल्ल
तत् + लीन = तल्लीन

त् + श = च्छ
तत् + शिव = तच्छिव

त् + ह = द्ध

पत् + हरि = पद्धति

(e) म् के परिवर्तन के नियम:-

(1) म्’ वर्ण के बाद किसी भी वर्ग का कोई भी वर्ण (क से म तक) आये तो ‘म्’ के स्थान पर उसी वर्ग के पांचवें वर्ण मे बदल जाता है।

उदाहरण: सम् + गति = संगति (म् – ङ) 
सम् + जीवनी = संजीवनी (म् – ञ)
सम् + तोष  = संतोष (म् – न)
सम् + पूर्ण = संपूर्ण (म् – म)

(2) ‘म्’ का मेल यदि ‘म्’, ‘र्’ , ‘ल’, ‘व’, ‘श’, ‘ष’, ‘स’, हो, तो ‘म्’ सदैव अनुस्वार (ं) ही रहता है। 
उदाहरण:- सम् + सार = संसार
सम् + रक्षक = संरक्षक
सम् + विधान = संविधान

(f) जब किसी स्वर के बाद ‘छ्’ आए तो ‘छ्’ से पहले ‘च्’ वर्ण जुड़ जाता है।
उदाहरण:- आ + छादन = आच्छादन

(g) स का ष मे परिवर्तन:- यदि ‘अ’ या ‘आ’ के अलावा कोई स्वर ‘स’ से पहले आता है तो ‘स’ का परिवर्तन ‘ष’ मे हो जाता है।
उदाहरण:- वि + साद = विषाद

(h) र का मे परिवर्तन:- यदि हृस्व स्वर के आगे ‘र्’ हो और उसका मेल ‘र्’ से हो तो हृस्व दीर्घ हो जाता है (मतलब छोटी मात्रा बड़ी मात्रा मे बदल जाती है) तथा ‘र्’ का लोप हो जाता है।
उदाहरण:- निर् + रोग = निरोग

(i) न् का ण मे परिवर्तन:- यदि ‘ऋ’, ‘र्’, ‘ष’ के बाद न हो और इनके बीच कोई स्वर ‘क’ वर्ग ‘प’ वर्ग ‘य्’, ‘र्’, ‘ल्’, ‘व’ हो तो ‘न्’ का (ण्) हो जाता है।
उदाहरण:- प्र + नाम = प्रणाम

विसर्ग संधि किसे कहते हैं

विसर्ग संधि की परिभाषा :विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन के मिलने से होने वाले परिवर्तन को विसर्ग संधि कहते हैं।

(a) विसर्ग का ‘ओ’ में परिवर्तन:-
मन: + रथ = मनोरथ
यश: + दा = यशोदा
सर: + ज = सरोज

(b) विसर्ग का ‘र्’ में परिवर्तन:-
नि: + धन = निर्धन
नि: + भय = निर्भय
निः + दय = निर्दय

(c) विसर्ग का’ श्’ में परिवर्तन:-
नि: + चय = निश्चय
निः + चल = निश्चल

(d) विसर्ग का ‘स्’ में परिवर्तन:-
नि: + संकोच = निस्संकोच
नमः + ते = नमस्ते

(e) विसर्ग का ‘ष्’ में परिवर्तन:-
निः + पाप = निष्पाप
दुः + कर्म = दुष्कर्म

(f) विसर्ग का लोप होना:-
नमः + कार = नमस्कार
अतः + एव = अतएव
निः + रस = नीरस

(g) विसर्ग में परिवर्तन न होना:-
प्रात: + काल = प्रातःकाल
अंत: + पुर = अंतःपुर

उदाहरण:(a) ए + अ = अय्
मे + अन = नयन
च + अन =चयन

ऐ + आ = आय्
नै + अक = नायक
गै + अक = गायक

ओ + अ = अव्
पो + अन = पवन
भो + अन = भवन

औ + आ = आव्
पौ + अक = पावक
धौ + अक = धावक

ओ + इ = अवि
पो + इत्र = पवित्र

औ + ई = आवि
नौ + इक = नाविक

औ + उ = आवु
भौ + उक = भावुक

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संधि से सम्बंधित कुछ सवाल जवाब

प्रश्न: स्वर संधि किसे कहते हैं?

उत्तर: जब किन्ही दो स्वरों के आपस में मिलने पर जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें स्वर संधि कहते हैं।जैसे: देव + आलय = देवालय (अ + आ = आ )

प्रश्न: स्वर संधि के कितने भेद होते हैं?

उत्तर: स्वर संधि के निम्न 5 भेद होते हैं
दीर्घ संधि
गुण संधि
वृद्धि संधि
यण संधि
अयादि संधि

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