कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन (B.A. First Year) | koma ki charitrik varnan

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प्रिय पाठक (Friends & Students)! allhindi.co.in में आपका स्वागत है। उम्मीद करता हूँ आप सब लोग अच्छे होंगे। आज की इस नये लेख में आप कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन के बारे में जानेंगे। तो चलिए आज की इस लेख की शुरुआत करते है। और जानते है कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन|

कोमा की चारित्रिक विशेषता

प्रश्न – कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए?
अथवा प्रश्न-‘कोमा प्रसाद के कवि हृदय की मनोरम अनुकृति है।’
ध्रुवस्वामिनी नाटक के विशिष्ट सन्दर्भ में इस कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिए?
प्रश्न-“जयशंकर प्रसाद ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में अतीत कथा के माध्यम से आधुनिक नारी की ऊर्जा और ओजस्विता का दिग्दर्शन कराना चाहते थे।” इस कथन आधार पर ‘कोमा’ के चरित्र की विशेषताओं को उद्घाटित कीजिए।

कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन
कोमा की चारित्रिक विशेषताओं का मूल्यांकन

भूमिका-

उत्तर-ध्रुवस्वामिनी नाटक की स्त्री पात्र कोमा काल्पनिक है। प्रसाद जी ने उसे आचार्य मिहिरदेव की पालित कन्या के रूप में नाटक में उपस्थित किया है। वह शकराज से प्रेम करती है और वह अपने प्रेम से शकराज को सुमार्ग पर लाने का प्रयास करती है। अपनी स्पष्टवादिता के द्वारा अन्यायों का विरोध करती हुई वह नाटक में दृष्टिगोचर होती है। अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण वह शकराज के द्वारा तिरस्कृत होती है और अन्त में रामगुप्त के सैनिकों द्वारा उसका दुःखद अन्त होता है।

आदर्श प्रेमिका-

कोमा एक आदर्श प्रेमिका हैं। वह यौवन के आरम्भ में ही शकराज से प्रेम करती हैं। प्रेम उसके चिन्तन का विषय है। ” यौवन को वह चंचल छाया मानती है। जिसमें वह प्रेम रस का पान करना चाहती है। उसके विचार में प्रेम करने की एक ऋतु होती है। उसमें चूकना या सोच-समझकर चलना उसकी दृष्टि में दोनों बराबर है। यद्यपि शकराज भी उससे प्रेम करता है तथापि उसे वह रूठने का अवसर नहीं देता।

ध्रुवस्वामिनी के आगमन का समाचार सुनकर वह अपने को संयमित नहीं कर पाती और उससे पूंछ बैठती है-‘राजा तुम्हारी स्नेह-सूचनाओं की सहज प्रसन्नता और मधुर अलापों ने जिस दिन मन के नीरस और नीरव शून्य में संगीत की वसन्त की और मकरन्द की सृष्टि की थी, उसी दिन से मैं अनुभूतिमयी बन गयी हूँ। क्या वह मेरा भ्रम था? कह दो-कह दो कि यह तेरी भूल थी।’

कोमा के यह शब्दअत्यन्त स्वाभाविक एवं दर्द से भरे हुए हैं। इन शब्दों में एक अबला के सम्पूर्ण जीवन का दर्द समाया हुआ है। अपने प्रेमी और परमेश्वर द्वारा प्रताड़ित एवं अपमानित होते हुए भी वह शकराज के विरूद्ध विद्रोह नहीं करती और प्रणय बन्धन को तोड़ना भी उसे अच्छा नहीं लगता।

उसके धर्मपिता मिहिरदेव जब इस प्रेम बन्धन को तोड़ डालने का उपदेश देते हैं तो वह स्पष्ट शब्दों में कहती हैं-“तोड़ डालू पिताजी। मैंने जिसे अपने आंसुओं से सींचा, वह दुलार भरी वल्लरी मेरे आँख बन्द कर चलने में मेरे ही पैरों से उलझ गयी है। दे दूँ एक झटका-उसकी हरी-हरी पत्तियाँ कुचल जायें और वह छिन्न होकर धूल में लोटने लगे? ना, ऐसी कठोर आज्ञा न दो।”

विवेकमयी

कोमा विवेकमयी थी। उसका प्रेम-भाव विवेक पर आधारित है, इसीलिए उसके धर्म पिता द्वारा जब प्रेम बन्धन को तोड़ने का आदेश मिलता है तो उसके हृदय में द्वन्द्व का उदय होता है और अन्त में विजय विवेक की होती है। इसके परिणाम स्वरूप शकराज से वह कह उठती है-“प्रेम का नाम न लो। वह एक पीड़ा थी जो छूट गयी। उसकी कसक भी धीरे-धीरे दूर हो जायेगी। राजा, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती।

मैं तो दर्प से दीप्त तुम्हारी महत्त्वमयी पुरुष मूर्ति की पुजारिन थी, जिसमें पृथ्वी पर अपने पैरों से खड़े रहने की दृढ़ता थी। इस स्वार्थ मलिन कलुष से भरी मूर्ति से मेरा परिचय नहीं। अपने तेज की अग्नि में जो सब कुछ भस्म कर सकता हो, उस दृढ़ता, आकाश के नक्षत्र कुछ बना बिगाड़ नहीं सकते। तुम आशंका मात्र से दुर्बल-कम्पित और भयभीत हो।” इतना कहकर वह अपने आचार्य का अनुगमन करती है। इस प्रकार प्रेमी के पतन में सहायक होकर अथवा उसके अन्यायपूर्ण कुकृत्यों में सहयोग देकर वह नारी जाति के लिए लज्जा का विषय नहीं बनती।

शकराज का शव मांगते समय ध्रुवस्वामिनी के समक्ष उसका पुनः दर्शन दर्शकों को मिल जाता है। वह ध्रुवस्वामिनी से कहती है-‘रानी, तुम भी स्त्री हो क्या स्त्री की व्यथा न समझोगी। आज तुम्हारी विजय का अन्धकार भले ही तुम्हारे शाश्वत स्त्रीत्व को ढंक ले, किन्तु सबके जीवन में एक बार प्रेम की दीवाली जलती है। जली होगी अवश्य। तुम्हारे भी जीवन में वह आलोक का महोत्सव आया होगा, जिसमें हृदय-हृदय को पहचानने का प्रयत्न करता है, उदार बनता हैं और सर्वस्वदान करने का उत्साह रखता है। मुझे शकराज का शव चाहिए। “कोमा के यह शब्द करुणा से ओत-प्रोत हैं।

अन्याय की विरोधिनी-

कोमा अन्याय का विरोध करने वाली है। इसी कारण वह अपने प्रेमी शकराज का विरोध करती है। ध्रुवस्वामिनी की मांग को वह अन्याय मुक्त मानती है। इसीलिए इसका विरोध करते हुए कहती है-‘ मेरे राजा आज तुम एक स्त्री को अपने पति से विच्छिन कराकर अपने गर्व की तृप्ति के लिए कैसा अनर्थ कर रहे हो?” इस प्रकार वह किसी भी तारी के अपमान का अपना अपमान समझती है और शकराज का विरोध करती है। उसकी यही भावना उसे नारीत्व के उच्चतम शिखर पर बिठा देती है।

स्पष्टवक्ता-

कीमा एक स्पष्ट वक्ता है। वह बिना किसी डर भय के अपने मत की व्यक्त कर देती है। वह जहाँ दूसरे के दोषों को स्पष्ट कर सकती है, वहीं अपने दोषों को छिपाने का प्रयास नहीं करती। शकराज के । सामने उसके प्रश्नों की व्याख्या प्रस्तुत करना, आचार्य मिहिरदेव के साथ जाने का निश्चय और शकराज को दूसरे की पत्नी को अपमानित करने से रोकना इत्यादि उसके इसी गुण का परिचय देते हैं। यह स्पष्ट शब्दों में शकराज का विराध करते हुए कहती है-“अभावमयी लघुता में मनुष्य अपने को महत्त्वपूर्ण दिखाने का अभिनय न करे तो क्या अच्छा नहीं है?”

सहज हृदय-

कोमा सरल हृदय वाली है। वह राजनीति के छल-प्रपंचों से दूर रहने वाली है। प्रतिशोध की भावना से उसका दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। अहंकार और दूसरे का दुःख उसे सहन नहीं है। इसीलिए वह शकराज को समझाते हुए कहती है-“संसार के नियम के अनुसार आप अपने से महान के सम्मुख थोड़ा-सा विनीत बनकर इस उपद्रव से अलग रह सकते थे।”

सौन्दर्य की उपासिका

कोमा सौन्दर्य की उपासना करने वाली है। मनुष्यों के मलिन मन के विपरीत वह स्वच्छता की आकांक्षी है। इसीलिए वह बसन्त का स्वागत करती है। पुरुषों के प्रति आकर्षित होती है। वह निष्कलुष सौन्दर्य की पुजारिन है। वह कहती है-“बसन्त का उदास और आलस पवन आता है, चला जाता है। कोई स्पर्श परिचित नहीं।” कोमा का यह कथन उसकी सौन्दर्यप्रियता को स्पष्ट करने में पूर्ण सक्षम है।

विनय एवं शालीनता-

कोमा विनय एवं शालीनता की मूर्ति है। वह विनय को मानव का आभूषण मानती है। इसीलिए वह बड़े के समक्ष झुकने में छोटेपन का अनुभव नहीं करती। इसीलिए वह मदिस को नहीं बल्कि शीतल जल को प्यास की तृप्ति का सर्वोत्तम साधन मानती है। इसीलिए वह शकराज से कहती है-“हाँ राजा! पाषाणों के भीतर भी कितने मधुर स्रोत बहते रहते हैं। उनमें मदिरा नहीं, शीतल जल की धारा बहती है। प्यासों की तृप्ति।”

भावुकता एवं दार्शनिकता-

कोमा भावुक ‘एवं दार्शनिक भी है। वह सामान्य बात को भी बड़ा मानती है। पौधों की रूक्षता एवं मलीनता से उसे दुःख होता है। वह अति व्यस्त जीवन को अच्छा नहीं मानती। मानव का स्वयं के द्वारा अपने को महान बताना उसकी समझ से परे है। यहाँ तक कि साधारण वार्तालाप में भी वह अपनी दार्शनिकता का पुट अवश्य छोड़ती जाती है। वह शकराज से कहती है-‘ “संसार में बहुत-सी बातें बिना अच्छी हुए भी अच्छी लगती हैं और बहुत-सी अच्छी बातें बुरी मालूम पड़ती हैं।”

कोमा की दार्शनिकता के पीछे उसके धर्म पिता मिहिरदेव की शिक्षा का प्रमुख हाथ है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि कोमा का चरित्र एक प्राचीन भारतीय नारी का आदर्श रूप है। उसमें वे सभी गुण विद्यमान हैं जो एक आदर्श भारतीय स्त्री के लिए अपेक्षित है। उसका सम्पूर्ण जीवन करुणा से ओत-प्रोत है। समर्पण उसके जीवन का मूल आधार है, इसीलिए वह एक बार रीझकर जीवन भर खीझती रही। वह दूर भी गयी किन्तु अपने आराध्य से अपना सम्बन्ध विच्छेद न कर सकी।

उसे पुनः लौटना पड़ा और शव के लिए याचना करनी पड़ी। उसकी यह याचना एक भिखारिन की याचना थी। इस सम्बन्ध में डॉ जगरनाथ शर्मा का मत है कि ” यहाँ उसके स्त्रीत्व का शाश्वत रूप प्रकट होता है। इस स्थल पर सम्पूर्ण दार्शनिकता को पराजित करता हुआ अखण्ड नारीत्व जागता हुआ दिखायी पड़ता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कोमा निश्चय ही प्रसाद के कवि हृदय की मनोरम प्रतिकृति है।

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