[BA 1st] कोमा का चरित्र चित्रण | Koma Ka Charitra Chitran

प्रिय पाठक allhindi.co.in के एक नए लेख में आप सभी का स्वागत है। आज के इस लेख में आप कोमा का चरित्र चित्रण जानने वाले हैं। यह प्रश्न BA 1st year के बच्चों की परीक्षाओ में अक्सर पूछे जाते हैं। इस लेख जिस प्रकार से हैडिंग के साथ लिखा गया हैं। उस प्रकार से आप परीक्षाओ में भी लिख सकते हैं।

कोमा का चरित्र चित्रण

कोमा का चरित्र चित्रण
कोमा का चरित्र चित्रण

इस लेख में कोमा का चरित्र चित्रण के अलग अलग शीर्षक को जानेंगे|

  • भूमिका
  • आदर्श प्रेमिका
  • विवेक मयी
  • अन्याय की विरोधिनी
  • स्पष्टवक्ता
  • सहज हृदय

भूमिका

भूमिका– ध्रुवस्वामिनी नाटक की स्त्री पात्र कोमा काल्पनिक है। प्रसाद जी ने उसे आचार्य मिहिरदेव की पालित कन्या के रूप में नाटक में उपस्थित किया है। वह शकराज से प्रेम करती है और वह अपने प्रेम से शकराज को सुमार्ग पर लाने का प्रयास करती है। अपनी स्पष्टवादिता के द्वारा अन्यायों का विरोध करती हुई वह नाटक में दृष्टिगोचर होती है।अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण वह शकराज के द्वारा तिरस्कृत होती है और अन्त में रामगुप्त के सैनिकों द्वारा उसका दुःखद अन्त होता है।

आदर्श प्रेमिका

आदर्श प्रेमिका-कोमा एक आदर्श प्रेमिका हैं। वह यौवन के आरम्भ में ही शकराज से प्रेम करती हैं। प्रेम उसके चिन्तन का विषय है। ” यौवन को वह चंचल छाया मानती है। जिसमें वह प्रेम रस का पान करना चाहती है। उसके विचार में प्रेम करने की एक ऋतु होती है। उसमें चूकना या सोच-समझकर चलना उसकी दृष्टि में दोनों बराबर है। यद्यपि शकराज भी उससे प्रेम करता है तथापि उसे वह रूठने का अवसर नहीं देता।

ध्रुवस्वामिनी के आगमन का समाचार सुनकर वह अपने को संयमित नहीं कर पाती और उससे पूंछ बैठती है-‘राजा तुम्हारी स्नेह-सूचनाओं की सहज प्रसन्नता और मधुर अलापों ने जिस दिन मन के नीरस और नीरव शून्य में संगीत की वसन्त की और मकरन्द की सृष्टि की थी, उसी दिन से मैं अनुभूतिमयी बन गयी हूँ। क्या वह मेरा भ्रम था? कह दो कह दो कि यह तेरी भूल थी।’ कोमा के यह शब्द अत्यन्त स्वाभाविक एवं दर्द से भरे हुए हैं।

इन शब्दों में एक अवला के सम्पूर्ण जीवन का दर्द समाया हुआ है। अपने प्रेमी और परमेश्वर द्वारा प्रताड़ित एवं अपमानित होते हुए भी वह शकराज के विरुद्ध विद्रोह नहीं करती और प्रणय बन्धन को तोड़ना भी उसे अच्छा नहीं लगता। उसके धर्मपिता मिहिरदेव जब इस प्रेम बन्धन को तोड़ डालने का उपदेश देते हैं तो वह स्पष्ट शब्दों में कहती हैं-“तोड़ डालू पिताजी। मैंने जिसे अपने आंसुओं से सींचा, वह दुलार भरी वल्लरी मेरे आँख बन्द कर चलने में मेरे ही पैरों से उलझ गयी है। दे दूं एक झटका-उसको हरी-हरी पत्तियाँ कुचल जायें और वह छिन्न होकर धूल में लोटने लगे? ना, ऐसी कठोर आज्ञा न दो।”

विवेक मयी

विवेक मयी-कोमा विवेकमयी थी। उसका प्रेम-भाव विवेक पर आधारित है, इसीलिए उसके धर्म पिता द्वारा जब प्रेम बन्धन को तोड़ने का आदेश मिलता है तो उसके हृदय में द्वन्द्व का उदय होता है और अन्त में विजय विवेक की होती है।इसके परिणाम स्वरूप शकराज “प्रेम का नाम न लो। वह एक पीड़ा थी जो छूट से वह कह उठती गयी। उसकी कसक भी धीरे-धीरे दूर हो जायेगी।

राजा, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती। मैं तो दर्प से दीप्त तुम्हारी महत्त्वमयी पुरुष मूर्ति की पुजारिन थी, जिसमें पृथ्वी पर अपने पैरों से खड़े रहने की दृढ़ता थी। इस स्वार्थ मलिन कलुष से भरी मूर्ति से मेरा परिचय नहीं। अपने तेज की अग्नि में जो सब कुछ भस्म कर सकता हो, उस दृढ़ता, आकाश के नक्षत्र कुछ बना बिगाड़ नहीं सकते। तुम आशंका मात्र से दुर्बल-कम्पित और भयभीत हो।” इतना कहकर वह अपने आचार्य का अनुगमन करती है। इस प्रकार प्रेमी के पतन में सहायक होकर अथवा उसके अन्यायपूर्ण कुकृत्यों में सहयोग देकर वह नारी जाति के लिए लज्जा का विषय नहीं बनती। शकराज का शव मांगते समय ध्रुवस्वामिनी के समक्ष उसका पुनः दर्शन दर्शकों को मिल जाता है।

वह ध्रुवस्वामिनी से कहती है-‘ रानी, तुम भी स्त्री हो क्या स्त्री की व्यथा न समझोगी आज तुम्हारी विजय का अन्धकार भले ही तुम्हारे शाश्वत स्त्रीत्व को ढंक ले, किन्तु सबके जीवन में एक बार प्रेम की दीवाली जलती है। जली होगी अवश्य।तुम्हारे भी जीवन में वह आलोक का महोत्सव आया होगा, जिसमें हृदय-हृदय को पहचानने का प्रयत्न करता है, उदार बनता हैं और सर्वस्वदान करने का उत्साह रखता है। मुझे शकराज का शव चााहिए। ” कोमा के यह शब्द करुणा से ओत-प्रोत हैं।

अन्याय की विरोधिनी

अन्याय की विरोधिनी-कोमा अन्याय का विरोध करने वाली है। इसी कारण वह अपने प्रेमी शकराज का विरोध करती है। ध्रुवस्वामिनी की मांग को वह अन्याय मुक्त मानती है। इसीलिए इसका विरोध करते हुए कहती है-‘ मेरे राजा आज तुम एक स्त्री को अपने पति से विच्छिन कराकर अपने गर्व की तृप्ति के लिए कैसा अनर्थ कर रहे हो? ” इस प्रकार वह किसी भी नारी के अपमान को अपना अपमान समझती है और शकराज का विरोध करती है। उसकी यही भावना उसे नारीत्व के उच्चतम शिखर पर बिठा देती है।

स्पष्टवक्ता

स्पष्टवक्ता-कोमा एक स्पष्ट वक्ता है। वह बिना किसी डर भय के अपने मत को व्यक्त कर देती है। वह जहाँ दूसरे के दोषों को स्पष्ट करसकती है, नहीं अपने दोषों को छिपाने का प्रयास नहीं करती। शकराज के सामने उसके प्रश्नों की व्याख्या प्रस्तुत करना, आचार्य मिहिरदेव के साथ जाने का निश्चय और शकराज को दूसरे की पत्नी को अपमानित करने से रोकना इत्यादि उसके इसी गुण का परिचय देते हैं।यह स्पष्ट शब्दों में शकराज का विरोध करते हुए कहती है-“अभावमयी लघुता में मनुष्य अपने को महत्त्वपूर्ण दिखाने का अभिनय न करे तो क्या अच्छा नहीं है?”

सहज हृदय

सहज हृदय-कोमा सरल हृदय वाली है। वह राजनीति के छल-प्रपंचों से दूर रहने वाली है। प्रतिशोध की भावना से उसका दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। अहंकार और दूसरे का दुःख उसे सहन नहीं है। इसीलिए वह शकराज को समझाते हुए कहती है-“संसार के नियम के अनुसार आप अपने से महान के सम्मुख थोड़ा-सा विनीत बनकर इस उपद्रव से अलग रह सकते थे।”

सौन्दर्य की उपासिका कोमा सौन्दर्य की उपासना करने वाली है। मनुष्यों के मलिन मन के विपरीत वह स्वच्छता की आकांक्षी है। इसीलिए वह बसन्त का स्वागत करती है। पुरुषों के प्रति आकर्षित होती है। वह निष्कलुष सौन्दर्य की पुजारिन है।

 

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