Kavi Kartavya Saransh PDF | कवि कर्तव्य सारांश पीडीएफ

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कवि कर्तव्य सारांश पीडीएफ
कवि कर्तव्य सारांश पीडीएफ

कवि कर्तव्य सारांश पीडीएफ के बारे (kavi kartavya saransh pdf)

निबन्ध का शीर्षक आकर्षण, जिज्ञासाबर्द्धक हो। यह पूरे निबन्ध का पूर्वाभास देने में समर्थ हो। इसका शीर्षक ही इस बात का उ‌द्घोष कर देता है, कि इसमें लैला-मजनू का किस्सा नहीं अपितु इसमें कवियों के कर्तव्य का विवेचन किया गया है। उन्हें यह शिक्षा दी गयी है, कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

‘कवि कर्तव्य’ महावीर प्रसाद द्विवेदी का एक विचारात्मक निबन्ध है, इसमें लेखक ने कवियों के कर्तव्य की ओर इंगित किया है, ओर स्पष्ट किया है, कि हिन्दी के कवियों को संस्कृत के छन्दों का भी प्रयोग अपनी कविता में करना चाहिए। तथा परम्परा से चले आ रहे घिसे-पिटे विषयें जैसे-नायिका भेद, नखशिख वर्णन आदि से विमुख होकर उपदेशात्मक कविताएं लिखकर हिन्दी काव्य के कलेवर कीवृद्धि करनी चाहिए। निबन्ध का प्रारम्भ :- निबन्ध का प्रारम्भ में लेखक ने कविके लिए अपेक्षित गुणों की ओर इंगित कर निबन्ध को चार भागों में विभक्त कर दिया है।

छन्द, भाषा, एवं विषय:

शीर्षकों के अन्तर्गत सम्पूर्ण विषय का समावेश है कवियों के लिए छन्द एवं भाषा का विवेचन निबन्ध के आदि भाग के अन्तर्गत आता हैं। द्विवेदी जी ने इसमें हिन्दी के कवियों को केवल सीमित न रहने की नेक सलाह दी है।

इस प्रकार निबन्ध में अच्छे साहित्य का समावेश हो और साथ ही भाषा की एकरूपता के लिए व्याकरण सम्मत भाषा के प्रयोग पर बल दिया है। वे कवियों को सरल, सरस, प्रवाहपूर्ण एवं सभाजनों की बोल-चाल वाली भाषा की वकालत की है। निबन्ध के, आदि भाग में लेखक ने छन्द एवं भाषा से सम्बन्धित विविध प्रकार से विचार कर कवियों का मार्ग दर्शन किया है।

निबन्ध का मध्य भाग:

निबन्ध के मध्य भाग में लेखक ने कवियों के विषय और उसके अर्थ से सम्बन्धित प्रश्नों का विवेचन प्रस्तुत किया है। ये कविताएँ उपदेशात्मक एवं आदर्शात्मक होनी चाहिए। प्राचीन परिपाटी के अनुसरण पर लिखी कविताएं में वर्तमान के अनुकूल है, और न जनकल्याणकारी है। आज न तो समाज को लाक्षणिक ग्रन्थों की आवश्यकता है, और न नायक नायिका भेदपरक काव्य की।

द्विवेदी जी ने कवियों का शब्द चयन के लिए भी सावधानी – बरतने की सलाह ही उनकी मान्यता है, कि शब्दों को उनके प्रकृत रूप में ही प्रयुक्त किया जाये और उन्हीं शब्दों को प्रयुक्त किया जाये जो अभीत्सित अर्थ को व्यंजित करने में पूर्ण समर्थ हों।

निबन्ध का प्रतिपाद्य:

लेखक की मान्यता है, कि आज भी = हिन्दी कविता मानव, की हित साधिका नहीं है, उसमें एकरूपता भी नहीं है। वह एक बँधी बधाई परिपाटी का अनुकरण मात्र है। भाषाकी व्याकरण सम्मत नहीं है, शब्दों को भी उनके प्रकृत रूप में प्रयुक्त न कर उन्हें तोड़ा मरोड़ा जा रहा है, ताकि कविता में नवीनता आये। भाषा की शुद्धता बनी रहे। नये-2 छन्दों का प्रयोग हो। नवीन उपमानों का प्रयोग हो।

इस प्रकार लेखक हिन्दी के कवियों के मार्गदर्शन द्वारा हिन्दी भाषा एवं हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि की कामना करता ताकि वह राष्ट्र भाषा के सम्मानित पद की अधिकारिणी बनी रहे।

निबन्ध का अन्त:

निबन्ध के अन्तिम भाग में लेखक ने यहस्पष्ट किया है, कि आज के कवियों को जनमानस के रूचि के अनुसार ही काव्य का प्रणयन करना चाहिए। ताकि लोग प्राचीन कवता के साथ ही साथ नवीन कविताओं की ओर आकृष्ट हो सकें। कवियों को अपनी कविताओं, नव्य उपमान योजना, नवीन शब्दों तथा नूतन विचारों का समावेश करना चाहिए तथा समयानुकूल काल्पनिक अथवा सत्य आख्यानों के द्वारा समाज को नैतिक, धार्मिक शिक्षा प्रदान करने का सत् प्रयास करना चाहिए। इसी से कवित्व का प्रसार होगा और कवि की कीर्ति पताका भी फहरायेगी।

 निष्कर्षः

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, आलोच्य निबन्ध द्विवेदी जी का एक बहुचर्चित निबन्ध है। इसमें विचारों का प्रधान्त है और यन्त्र तत्र व्यंग्य का पुट है।

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