[B.A. 1st] Karuna Nibandh Ka Saransh | करुणा निबंध का सारांश

प्रिय पाठक allhindi.co.in के एक नए लेख में आप सभी का स्वागत है। आज के इस लेख में आप करुणा निबंध का सारांश (Karuna Nibandh Ka Saransh) जानने वाले हैं। यह प्रश्न BA 1st year के बच्चों की परीक्षाओ में अक्सर पूछे जाते हैं। इस लेख जिस प्रकार से हैडिंग के साथ लिखा गया हैं। उस प्रकार से आप परीक्षाओ में भी लिख सकते हैं।

Karuna Nibandh Ka Saransh |करुणा निबंध का सारांश

करुणा निबंध का सारांश [Karuna Nibandh Ka Saransh]

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के उच्च कोटि के निबन्धकार हैं उनके निबन्ध चिन्तामणि-1 में संकलित हैं आचार्य शुक्ल के निबन्ध दो प्रकार के है 1. भाव या मनोविकारों से सम्बन्धित। 2. सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक आलोचना से सम्बन्धित, करूणा, उत्साह, ईर्ष्या, क्रोध, श्रद्धा और भक्ति आदि निबन्ध भाव या मनोविकार से सम्बन्धित निबन्ध है। ‘काव्य में लोक मंगल की साधनावस्था या’ कविता क्या है ‘निबन्ध सैद्धान्तिक एवं व्यावाहारिक आलोचना से सम्बन्धित है।

1. करूणा की परिभाषा: करूणा को परिभाषित करते हुये आचार्य शुक्ल ने लिखा है’ जब बच्चे को सम्बन्ध ज्ञान कुछ-2 होने लगता है तभी दुःख के उस भेद की नीवं पड़ जाती है। जिसको करूणा कहते है।

2. प्रवृत्ति के विचार से करूणा का उल्टा क्रोध है -यदि प्रवृत्ति की दृष्टि से देखा जाय तो करूणा का उल्टा क्रोध है। जिसके प्रति क्रोध उत्पन्न होता है उसके नुकसान की चेष्टा की जाती है और जिसके प्रति करुणा उत्पन्न होती है उसकी भलाई की बात ही सोची जाती है। इस प्रकार हम देखते है कि करूणा भलाई का कारक है और क्रोध हानि का कारक है।

3. करूणा की प्राप्ति के लिये पात्र में दुःख को अतिरिक्त किसी विशेषता की अपेक्षा नहीं कोई भी मनुष्य जब समाज में प्रवेश करता है, तब उसके दुःख और सुख का अधिक भाग दूसरे की अवस्था पर अवलम्बित हो जाता है। मनुष्य के दुःख में दुखी होना, सुख में सुखी होना मानव प्रवृत्ति है जब किसी व्यक्ति को दुखी देख उसके भलाई की बात साचते हैं वही करूणा है।

4. दूसरों के दुःख के परिज्ञान से उत्पन्न दुःख करूणा है-दूसरे के दुःख को देखकर कष्ट का अनुभव होना ही करूणा है। जब किसी पर करुणा की जाती है तब मनुष्य उसके सुख और दुःख दोनों की चिन्ता करता है। जब दूसरे के दुःख से मन बिहवल या बेचैन हो उठता है उसी भाव को करूणा कहते है।

5. मनुष्य के भीतर शील और सात्विकता का संस्थापक करूणा है मनुष्य के भीतर शील, सात्विकता दान, क्षमा आदि गुण होने चाहिए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में सदभाव एक-दूसरे से ठीक सम्बन्ध रखने के लिये इन गुणों का होना आवश्यक हैं इन गुणों का अपने अन्दर समावेश करने के लिये मनुष्य को करूणा से युक्त होना पड़ेगा। करूणा ही इन गुणों का संस्थापक हैं।

6. करूणा और सात्विकता में गहरा सम्बन्ध है-मनुष्य के हृदय में सात्विक भावों को जगाने वाली करूणा है। करूणा सात्विक भाव को उत्पन्न करने वाली हैं। किसी व्यक्ति को करूणा करते देख जब उसके प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है और सभी प्रकार से हम उसका अच्छा या भला सोचते है।

7. करुणा करने वाले पर श्रद्धा उत्पन्न होती है करुणा करने वाले व्यक्ति के व्यक्ति के कार्य को देखकर उसके प्रति जो भाव उत्पन्न होता है। उसे हम श्रद्धा कहते हैं।

8. वियोग से उत्पन्न दुःख में करूणा का अंश होता है जब हम किसी व्यक्ति से बिछड़ जाते है या अलग हो जाते है तो याद करने पर दुःख की अनुभूति होती है और वियोग से जनित दुःख में करूणा मिली रहती हैं।

9. किसी-2 प्रान्तिक भाषा में करुणा को मोह कहते है: जो करुणा हमें साधारण लोगों के वास्तविक दुःख के ज्ञान से होती है, वही करूणा अपने को प्रिय लगने वाले लोगों के सुख के निश्चित न होने मात्र से होती है। इसी अभास या ज्ञान को कई भाषाओं में ‘मोह’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है।

10. करूणा अपना बीज अपने पात्र में नहीं फेकती-करुणा की बात की जाती है वह बदले में करुणा करने वाले व्यक्ति पर करूणा नहीं करता-जैसा कि क्रोध और प्रेम के भाव में होता है। क्रोध के भाव से दूसरे व्यक्ति के भीतर भी क्रोध का भाव ही उत्पन्न होता है। जब कोई व्यक्ति किसी से प्रेम करता है तो दूसरा व्यक्ति भी उससे प्रेम ही करता है। जब कि किसी भी व्यक्ति पर करूणा की जाती है तो दूसरा व्यक्ति उसके पर करूणा नहीं कर सकता क्योंकि करूणा करने वालों व्यक्ति को करूणा की आवश्यकता नहीं होती वह सक्षम होता है।

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