इक्विटी क्या होता है | Equity Kya Hota Hai

अगर आप किसी बिजनेस को स्टार्ट करने वाले हैं तो बिजनेस स्टार्ट करने से पहले आपको कुछ जरूरी बातों के बारे में जानकारी ले लेनी चाहिए नहीं तो भविष्य में आपके और आपके कंपनी के लिए खतरा हो सकता है। कंपनी स्टार्ट करने से पूर्व क्या-क्या जानकारी जरूरी है आइए इस लेख में के माध्यम से कुछ मूलभूत जानकारी लेते हैं और समझते हैं कि इक्विटी क्या होता है (Equity Kya Hota Hai)? इक्विटी कितने प्रकार की होती है? शेयर होल्डर क्या है इक्विटी शेयर कैसे काम करता है?

इक्विटी क्या होता है? ( Equity Kya Hota Hai )

जब किसी कंपनी में कोई इन्वेस्टर कंपनी के शुरुआती पूंजी में इन्वेस्ट करता है तो उसे उस इन्वेस्टमेंट के बदले कंपनी की ओनरशिप मिलती है। जिसे इक्विटी कहते हैं।

Equity Kya Hota Hai

इक्विटी का उदाहरण

चलिए इक्विटी को एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए मुझे एक कंपनी स्टार्ट करनी है तथा उस कंपनी को स्टार्ट करने में 10 लाख रुपए लग रहे हैं। और मैंने उस कंपनी में मालिक के रूप में 3 लाख रुपए इन्वेस्ट कर दिए। और बाकी बचे 7 लाख रुपए को बैंक से लोन ले लिया।

चूंकि हम किसी कंपनी में जितना इन्वेस्ट करते हैं हम उस कंपनी के उतने प्रतिशत इक्विटी के मालिक बन जाते हैं। चूंकि मैंने कंपनी में 3 लाख रुपए इन्वेस्ट किए हैं इसलिए मैं उस कंपनी के सिर्फ 30% प्रतिशत इक्विटी का मालिक हो गया। क्योंकि बाकी बचे 7 लाख रुपए तो मैंने अपने पैसे न लगाकर बैंक से लोन लिया था।

अब सवाल यह उठता है कि बैंक ने तो मुझे 7 लाख रुपए दिए थे तो क्या बैंक मेरी कंपनी में 70% प्रतिशत इक्विटी का मालिक हो गया। जी नहीं, बैंक ने मुझे 7 लाख रुपए लोन के रूप में दिया है, न कि मेरी कंपनी में इन्वेस्ट किया है। मतलब अगर बैंक मुझे 7 लाख रुपए लोन न देकर  मेरी कंपनी में इन्वेस्ट किया होता, तब जाकर बैंक उस कंपनी के 70% प्रतिशत इक्विटी का मालिक होता।

अब आपके दिमाग में यह सवाल आ रहा होगा की 30% प्रतिशत इक्विटी तो मेरे पास है बाकी 70% प्रतिशत इक्विटी किसके पास है? तो आप यह जान लीजिए कि उस 70% इक्विटी पर अभी भी मेरा ही अधिकार है।

हालांकि जैसे-जैसे मैं बैंक लोन को चुकाता जाऊंगा, वैसे-वैसे मैं कंपनी के बाकी बचे इक्विटी का मालिक होता चला जाऊंगा। और जब मैं बैंक लोन को पूरी तरह से चुका दूंगा, तब मैं अपनी कंपनी के 100% इक्विटी का मालिक हो जाऊंगा।

इक्विटी शेयर की विशेषताएं 

  • इक्विटी शेयर किसी भी कंपनी के द्वारा अपने कुछ खास इन्वेस्टर्स को लंबे समय तक इनकम देने वाले स्रोत होते हैं।
  • इक्विटी शेयर किसी कंपनी के शुरुआती दौर में पूंजी लगाने वाले कुछ खास इन्वेस्टर्स लिए जारी किए जाते हैं।
  • इक्विटी शेयर होल्डर्स के पास किसी कंपनी में वोट देने, प्रॉफिट शेयर करने तथा कंपनी की संपत्ति का दावा करने का अधिकार होता है।

इक्विटी कितने प्रकार की होती है?

इक्विटी दो प्रकार की होती है।

  • एक कंपनी का मालिक स्वयं होता है
  • दूसरा जो इन्वेस्टर इन्वेस्ट करता है।

शेयर और शेयर होल्डर क्या होता है?

शेयर होल्डर किसी कंपनी के आंशिक स्वामित्व को प्रदर्शित करता है। जब कोई कंपनी स्टार्ट की जाती है तो शुरुआती पूंजी की आवश्यकता को कुछ खास इन्वेस्टर्स के द्वारा पूरी की जाती है। जो बाद में कंपनी के मालिक बन जाते हैं। जैसे-जैसे कंपनी ग्रोथ करती है वैसे वैसे कंपनी को बढ़ाने के लिए पूंजी की आवश्यकताएं भी बढ़ने लगती हैं। कंपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति बैंकों से लोन लेकर या नए इन्वेस्टर से संपर्क करके पूरा करती है।

पूंजी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सबसे आसान और पसंदीदा तरीका कंपनी के शेयर जारी करना है। इस प्रक्रिया में कंपनी अपने कुछ शेयर को लोगों के बीच लांच करती हैं। जब कोई व्यक्ति इन शेयर को खरीदता है तो उसे शेयर होल्डर कहा जाता है।

शेयर होल्डर होने के कारण इन्वेस्टर्स को कंपनी के प्रॉफिट में हिस्सा लेने का अधिकार भी मिलता है। भविष्य में जब कंपनी प्रॉफिट कमाने लगती है तब कंपनी में इन्वेस्ट करने के लिए कंपनी के बोर्ड ऑफ मेंबर एंड डायरेक्टर के द्वारा डिविडेंड के रूप में प्रॉफिट का कुछ हिस्सा शेयर होल्डर को दिया जाता है।

शेयर कितने प्रकार के होते है?

अगर हम बात करें स्टॉक मार्केट की, तो यह दो टाइप के होते हैं-

  • इक्विटी शेयर
  • सामान्य या प्रिफरेंस शेयर

इक्विटी शेयर क्या होता है?

जब कोई कंपनी स्टार्ट की जाती है तो कंपनी को स्टार्ट करने के लिए एक बड़ी पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। शुरुआती पूंजी की आवश्यकता की पूर्ति कम्पनी के मालिक या उस कंपनी में इंटरेस्टेड कुछ इन्वेस्टर्स के द्वारा की जाती है। जो इन्वेस्टर्स कंपनी के मूलधन पूंजी में इन्वेस्ट करते हैं, उन्हें कंपनी के द्वारा इक्विटी शेयर के रूप में दी जाती है। 

कंपनी के द्वारा जिन इन्वेस्टर्स को इक्विटी शेयर दी जाती है उन इन्वेस्टर्स को इक्विटी शेयर होल्डर कहा जाता है।

शेयर होल्डर को इक्विटी उस कंपनी में हिस्सेदारी संबंधित प्रमाण देता है। या यह कह सकते हैं कि जिस भी इन्वेस्टर्स के पास इक्विटी होती है, उसे उस कंपनी के निर्णयों और कार्य व्यवस्था की जानकारी और अपने विचार रखने का अधिकार होता है। इक्विटी शेयर होल्डर को कंपनी की ग्रोथ के साथ फायदा और कंपनी के लॉस में नुकसान दोनों तरह के मौके प्रदान करती है।

इक्विटी शेयर में इन्वेस्टिंग के फायदे क्या है?

कंपनी के दृष्टिकोण से देखा जाए इक्विटी शेयर होल्डर को बहुत से लाभ प्राप्त होता है। जिसमें से कुछ चुनिंदा दिए जा रहे हैं-

अधिक लाभ प्राप्त करने की क्षमता: किसी भी अन्य निवेश की तुलना में इक्विटी शेयर होल्डर को अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है। एक प्रकार से देखा जाए तो जब किसी कंपनी मंदी आती है, तो कंपनी के डिविडेंड में कमी हो सकती हैं परंतु पूंजीगत लाभ में प्रॉफिट की संभावना बनी रहती है।

मूल्य में वृद्धि: किसी कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर्स के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण लाभों में से एक है। क्योंकि इसमें इक्विटी शेयर होल्डर्स के संपत्ति एवं इन्वेस्ट की गई राशि में वृद्धि होती रहती हैं।

निवेश के अत्यधिक मात्रा में लाभ: किसी भी कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर्स को दो अलग-अलग तरीकों से लाभ मिलता रहता है। पहला तो कंपनी में इन्वेस्ट की गई पूंजी के कीमत में वृद्धि होती रहती हैं। और दूसरा कंपनी के संपत्ति में हिस्सेदारी शामिल होती है।

भुगतान की मात्रा: किसी कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर्स के लिए यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि इक्विटी शेयर होल्डर्स को उस कंपनी के द्वारा अधिक मात्रा में भुगतान किया जाता है।

शेयर स्थानांतरण: यदि किसी कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर चाहे तो अपनी इक्विटी शेयर को किसी दूसरे व्यक्ति या इन्वेस्टर्स को बड़ी आसानी से स्थानांतरित कर सकता है।

लोन लेने की क्षमता: यदि किसी कंपनी के अधिकतम शेयर कंपनी के मालिकों के पास है तो इन्हें बड़ी ही आसानी से किसी भी वित्तीय बैंक या निजी संस्थानों के द्वारा इक्विटी शेयर क्रेडिट लोन मिल सकता है।

टैक्स बेनिफिट: यदि कंपनी प्रॉफिट करती है तो इक्विटी शेयरों को खरीदने से इक्विटी शेयर होल्डर्स को बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं। और इस प्रॉफिट पर इक्विटी शेयर होल्डर्स को कम से कम दर पर टैक्स देना पड़ता है।

लिक्विड प्रकृति: किसी कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर्स के लिए यह भी एक महत्वपूर्ण लाभ है कि वह अपने इक्विटी शेयर को कभी भी और बड़ी आसानी से बेच सकता है।

प्रबंधन को नियंत्रण करने का अधिकार: इक्विटी शेयर होल्डर को सबसे बड़ा कोई लाभ यह मिलता है कि वह कंपनी के विकास, कार्य प्रबंधन से संबंधित जानकारी और वोटिंग का अधिकार होता है। जिससे उसे उस बिजनेस को चलाने के लिए अनुमति मिलती है। उसे कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए कुशल व्यक्तियों को को चुनने का भी अधिकार मिलता है।

इक्विटी शेयर होल्डर वैसे तो कंपनी के मालिक माने जाते हैं, इसलिए उन्हें कंपनी के प्रॉफिट का ज्यादातर हिस्सा लाभ के रूप में प्राप्त होता है।

नॉर्मल या प्रिफरेंस शेयर क्या होता है?

इस तरह के इन्वेस्टर्स अधिमान्य शेयर होल्डर होते हैं। इन्हें साधारण शेयर होल्डर के नाम से भी जाना जाता है। इस तरह के शेयर होल्डर को कंपनी के फैसलों तथा कार्य व्यवस्था की जानकारी संबंधित अधिकार नहीं होते हैं।

सामान्य शेयर होल्डर केवल कंपनी के प्रॉफिट के कुछ हिस्से को डिविडेंड के रूप में प्राप्त करने का अधिकार रखता है। परंतु डिविडेंड देना है या नहीं यह अधिकार कंपनी के इक्विटी शेयर होल्डर या मालिक का है।

नॉर्मल या प्रिफरेंस शेयर होल्डर को किस प्रकार का लाभ मिलता है?

यदि कोई कंपनी प्रॉफिट कमाती है तथा वह कंपनी उस प्रॉफिट के कुछ हिस्से को डिविडेंड के रूप में अपने अपने शेयर होल्डर को देने का निर्णय लेती है। तब साधारण शेयर होल्डर को डिविडेंड के रूप में कंपनी के प्रॉफिट का कुछ हिस्सा लाभ के रूप में प्राप्त होता रहता है।

इक्विटी शेयर में इन्वेस्टिंग के नुकसान क्या है?

इक्विटी शेयर में इन्वेस्टिंग के वैसे तो बहुत सारे नुकसान हैं परंतु यहां आपको कुछ महत्वपूर्ण नुकसान दिए जा रहे हैं-

इक्विटी मार्केट में उतार-चढ़ाव: किसी कंपनी का इक्विटी शेयर, शेयर मार्केट में सबसे अधिक अस्थिर भाग होता है। मान लीजिए शेयर मार्केट में मदी आ जाती है तो इक्विटी शेयर के प्रॉफिट में भी काफी असर देखने को मिल सकता है। शेयर मार्केट में मामूली सा उतार-चढ़ाव पर भी इक्विटी शेयर पर गहरा प्रभाव डालता है।

डिविडेंड के रूप में नुकसान: मान लीजिए कोई कंपनी वर्षों से डिविडेंड पे कर रही हैं। और किसी वर्ष मार्केट में मंदी होने के कारण कंपनी प्रॉफिट नहीं कर पाई और उस वर्ष डिविडेंड पे नहीं कर पाई तो इस अवस्था में इन्वेस्टर्स कंपनी पर डिविडेंड के लिए दावा कर सकती है जिससे कंपनी को भारी नुकसान सामना करना पड़ सकता है।

अत्यधिक रिस्क: वित्तीय बैंकों में फिक्स डिपॉजिट अन्य संस्थानों में इन्वेस्ट की तुलना में इक्विटी शेयरों में इन्वेस्ट करना अत्यधिक रिस्की होता है, क्योंकि कंपनी के प्रॉफिट के आधार पर डिविडेंड या अन्य लाभ दिए जाते हैं। मान लीजिए कोई कंपनी बीते कुछ सालों से प्रॉफिट नहीं कमा रही हैं तो वह शेयर होल्डर्स के शेयर के बदले कोई नहीं लाभ नहीं दे पाती है। और यह कहीं ना कहीं इन्वेस्टर्स के लिए नुकसानदायक है।

भुगतान: कंपनी के द्वारा अपने सभी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के बाद ही इक्विटी शेयर पर रिटर्न का भुगतान किया जाता है।

बाजार में मंदी के कारण बिजनेस के प्रोडक्शन सिस्टम पर काफी प्रभाव पड़ता है, जिससे प्रोडक्शन द्वारा प्राप्त होने वाला प्रॉफिट कम हो जाता है। और इस अवस्था में कंपनी को इक्विटी शेयर होल्डर्स को रिटर्न धनराशि डिसटीब्यूट करने से पहले मौजूदा लोन और कंपनी के प्राथमिक जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शेयर मार्केट में मंदी कहीं ना कहीं इक्विटी शेयरों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

इक्विटी शेयर में इन्वेस्टिंग के आधार पर लाभ और हानि की तुलना

जब भी कोई कंपनी शेयर लांच करती है। तो वह इन्वेस्टर्स को स्टॉक मार्केट में व्यापार करने की अनुमति देने के लिए प्रतिबंध हो जाती है। किसी कंपनी के शेयर की मांग और आपूर्ति के आधार पर शेयर की कीमत ऊपर और नीचे जा सकती है।

अगर किसी कंपनी के शेयर की मांग अधिक और आपूर्ति कम है तो शेयर की कीमत बढ़ने लगती है और इन्वेस्टर्स को फायदा हो सकता है। इसके विपरीत अगर किसी कंपनी के शेयर की मांग कम और आपूर्ति अधिक है तो शेयर की कीमत घटने लगती है और इन्वेस्टर्स को नुकसान होने की संभावना हो सकती है।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि मैंने ₹500 बाजार मूल्य पर एक कंपनी के कुछ शेयर खरीद लिये। 2 वर्ष बाद कंपनी के शेयर की मांग बढ़ने लगी और मार्केट में उस कंपनी के शेयर की आपूर्ति कम है तुम मुझे उस शेयर में फायदा होगा।

इसके विपरीत मान लीजिए मैंने ₹500 बाजार मूल्य पर उसी कंपनी के कुछ शेयर खरीद लिये। पर 2 वर्ष बाद कंपनी के शेयर की मांग कम और मार्केट में उस कंपनी के शेयर की आपूर्ति अधिक हो जाती है तो इस अवस्था में मुझे उस कंपनी के शेयर में नुकसान भी हो सकता है।

इक्विटी शेयर की सीमाएं

वैसे तो इक्विटी शेयर के अनेक फायदे हैं। परंतु इनके कुछ सीमाएं भी होती हैं। तो आइए जानते हैं इक्विटी शेयर की सीमाएं क्या है?

  • इक्विटी शेयरों के अत्यधिक लेनदेन से इस कंपनी का कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ जाता है।
  • इक्विटी शेयर से संबंधित मुद्दों में बड़े बदलाव तथा ब्रोकरेज के खर्चे को कंपनी का अंडरराइटिंग कमिशन सुनिश्चित करता है।
  • इक्विटी शेयरों की लागत उस कंपनी के अलग-अलग संस्थाओं के फाइनेंसियल सोर्स की लागत से कहीं ज्यादा होता है।
  • मेरी कंपनी में किसी प्रकार का नुकसान होता है इसका सीधा प्रभाव इक्विटी शेयर होल्डर पर जाता है।
  • इक्विटी शेयर होल्डर उस कंपनी के किसी मामले में पूरा नियंत्रण अपने हाथ में नहीं रख सकता है।

लोग शेयर में निवेश क्यों करते हैं?

लोगों का शेयर मार्केट के प्रति झुकाव के पीछे दो कारण है

  • उच्च आय (High Income)
  • मुद्रास्फीति (Inflation)
  • संपत्तियों का विविधीकरण (Diversification Across Assets)

उच्च आय (High Income)

इक्विटी शेयर इन्वेस्टर्स को हमेशा एक अच्छी और ज्यादा प्रॉफिट कमाने का स्रोत है। इक्विटी शेयर लॉन्ग टर्म ने अपने इन्वेस्टर्स को बहुत ज्यादा मात्रा में प्रॉफिट देता है जिससे इन्वेस्टर्स को अपने इन्वेस्ट किए हुए धन के ऊपर अतिरिक्त फायदा होता रहता है।

महंगाई  से बचाव: मुद्रास्फीति (Inflation)

आज की अपेक्षा आने वाले कल में महंगाई दर अधिक होगी। जैसे-जैसे हम भविष्य की तरफ आगे जाएंगे वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए अधिक से अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता पड़ेगी, इस घटनाक्रम को ही मुद्रास्फीति कहा जाता है।

भारत में आज मौजूदा महंगाई दर करीब 4 फ़ीसदी है मतलब जिस वस्तु एवं सेवाओं को खरीदने के लिए आज हम ₹100 दे रहे हैं आने वाले समय में ₹104 (क्योंकि 100 का 4% ₹4 होता है) का हो जाएगा। और 10 वर्षों में लगभग इसके 10 गुना हो जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि आप अपने बचत को इस तरह से इन्वेस्ट करें कि मुद्रास्फीति दर अधिक दर पर आपको प्रॉफिट के रूप में रिटर्न दे।

अगर आप अपने बचे हुए धनराशि को बैंकों के बचत खाते में रखते हैं तो बढ़ती महंगाई दर को आप कभी भी मात नहीं दे सकते हैं। इसलिए बहुत सारे इन्वेस्टर्स आजकल आय के स्रोत को बढ़ाने के लिए हाई प्रॉफिटेबल कंपनियों के शेयरों में इन्वेस्ट कर रहे हैं। और लाभ कमा रहे हैं।

इस प्रकार कंपनियों के शेयर में इन्वेस्ट करके लोग मुद्रास्फीति की दर को मात देने और अधिक से अधिक लाभ कमाने का प्रयास कर रहे हैं।

संपत्तियों का विविधीकरण (Diversification Across Assets)

आमतौर पर भारत के ज्यादातर लोग भारतीय बैंकों में फिक्स डिपॉजिट में इन्वेस्ट करना ज्यादा पसंद करते हैं। क्योंकि यह कम जोखिम वाला और सुरक्षित है। या एक ऐसा इन्वेस्ट विकल्प रहा है, जहां इन्वेस्टर्स को उनके इन्वेस्ट पर निश्चित दर पर रिटर्न मिलता है।

लोगों को अपने बचत को दो भागो में बांट देना चाहिए जिसके एक भाग को किसी कंपनी के शेयर खरीदने एवं रियल स्टेट खरीदने जैसी अस्थिर प्रॉफिट देने वाली कंपनियों में लगा देना चाहिए। तथा दूसरे भाग को किसी बैंक के फिक्स डिपॉजिट में फिक्स कर देना चाहिए।

कभी-कभी जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कमी करता है तो शेयर की कीमत गिरने लगती है जिसे इन्वेस्टर्स को कभी-कभी भारी नुकसान का सामना करना पड़ जाता है।

परंतु अगर आपने अपने दूसरे भाग को किसी बैंक के फिक्स डिपॉजिट में फिक्स किया है तो या एक बुद्धिमानी भरा निवेश हो सकता है क्योंकि एक भाग अगर हानि भी हो जाता है तो दूसरा भाग उसे मैनेज कर लेता है। इस प्रकार के अवधारणा को संपत्तियों का विविधीकरण कहा जाता है।

वैकल्पिक निवेश विकल्प (Alternative Investment Options)

इक्विटी शेयर, शेयर मार्केट में टोटल इन्वेस्टमेंट पर सबसे ज्यादा रिटर्न देते हैं। परंतु अगर यह सबसे ज्यादा रिटर्न देते हैं तो इसमें सबसे अधिक मात्रा में जोखिम भी जुड़े हुए हैं। इन सब परेशानियों से बचने के लिए बैंकिंग लोन के रूप में वैकल्पिक निवेश विकल्प अपनाया जा सकते हैं। जिसमें रिस्क कम होता है। परंतु कभी-कभी केंद्रीय बैंकों के द्वारा लोन दर में बढ़ोतरी करने के कारण इन्वेस्टर्स को रिटर्न कम मिलता है जिससे पर्याप्त पूंजीगत लाभ मिलने की संभावना कम हो जाती है। 

प्रश्न: कौन से शेयर धारक कंपनी के असली मालिक हैं?

उत्तर: इक्विटी शेयर धारक

प्रश्न: इक्विटी शेयर को हिंदी में क्या बोलते हैं?

उत्तर: हिस्सेदारी, साझेदारी

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