[ B.A. 1st year] Ekanki Natak Ke Udbhav Aur Vikas Par Prakash Daliye | एकांकी नाटक के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए

प्रिय पाठक! Allhindi के इस नये लेख में आपका स्वागत हैं। आज की इस लेख में आप एकांकी नाटक के उद्भव और विकास पर प्रकाश [ Ekanki Natak Ke Udbhav Aur Vikas Par Prakash ] को जानेंगे। इस लेख में आप एकांकी नाटक के उद्भव, एकांकी नाटक के विकास एवं के बारे में पढेंगे। एकांकी से जुड़े बहुत सारे प्रश्न आपको परीक्षाओ में पूछे जाते हैं इस लेख में आपको एकांकी नाटक के उद्भव और विकास को जानेंगे।

हिन्दी के एकांकी नाटक का उद्भव [ Ekanki Natak Ke Udbhav Aur Vikas Par Prakash ]

आधुनिक युग में एकांकी के जिस रूप का प्रचलन है, उसका विकास पाश्चात्य देशों में हुआ है। प्राचीन भारतीय साहित्य में भी एकांकी से मिलते-जुलते रूपकों का प्रचार रहा है। संस्कृत ‘नाट्यशास्त्र’ के आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रन्थ ‘नाट्यशास्त्र’ में पन्द्रह प्रकार के एक अंक वाले नाटकों का उल्लेख किया है। इनमें दस रूपक हैं, और पांच उपरूपक हैं। इस विषय पर विद्वानों का दो वर्ग है। एक वर्ग एकांकी का विकास संस्कृत के नाटकों से माना है और दूसरा वर्ग पाश्चात्य एकांकी नाटक के आधार पर माना है।

भारतीय नाटक के विभिन्न भेदों में व्यायोग, प्रहसन, भाषा, वीथी, नाटिका, गोष्ठी आदि में एक ही अंक होता है। अतः हम इन्हें प्राचीन ढंग के एकांकी कह सकते हैं। इसी के आधार पर डॉ० सरनाम सिंह, प्रो० ललित प्रसाद, और प्रो० सद्गुरूशरण अवस्थी ने एकांकी का उद्गम संस्कृत साहित्य से सिद्ध किया है। प्रो० अमर नाथ गुप्त, प्रो० प्रकाश चन्द गुप्त, डॉ० एम०पी० खत्री ने इसे पाश्चात्य साहित्य के देन के रूप में स्वीकार किया है।

संस्कृत एवं प्राकृत में ‘एकांकी’ के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। श्री प्रहलाद वन देव ने सन् 1161 ई0 में ‘पार्थ पराक्रम’ द्धव्यायोमऋ की रचना की थी। कन्दर्प केलि, धूर्तचरित्र, लटक मेलक, लता कामलेखा, धूर्तसमागम, धूर्तवाटिका आदि प्रहसन की कोटि में आने वाले एकांकियों में प्रमुख हैं। ‘भाग’ जिसमें केवल एक ही पात्र होता है-एकांकीकला का अत्यन्त विकसित रूप है। हमारे विचार से ‘हिन्दी एकांकी’ ने अपने प्रारम्भिक रूप में संस्कृत एकांकी से प्रेरणा ग्रहण की, परन्तु आगे चलकर उसने अपने वर्तमान स्वरूप का निर्माण पाश्चात्य एकांकी के आधार पर किया है।

हिन्दी का प्रथम एकांकी [ Hindi Ka Pratham Ekanki ]

हिन्दी एकांकी नाटक की परम्परा कहां से और कब से प्रारम्भ होती है, इस सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। कुछ लोग ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के लिखे गीति-नाटको (इन्दर सभा, वन्दर सभा आदि) को एकांकी का प्रारम्भिक रूप मानते हैं। आधुनिक एकांकी को देखते हुए इसे हम खींचतान ही कहेंगे।

विद्वानों का दूसरा वर्ग भारतेन्दु के एकांकियो अंधेर नगरी विषस्य विषमौषधम्, वैदिक हिंसा हिंसा न भवति से एकांकी की परम्परा स्थापित करता है। इन एकांकी नाटकों की रचना संस्कृत- एकांकियों के अनुकरण पर की गई है। इन्हें हम आधुनिक एकांकी का प्रारम्भिक रूप तो कह सकते हैं परन्तु आधुनिक एकांकी का जो विकसित रूप है निश्चय ही पाश्चात्य एकांकियों की देन है।

विद्वानों का तीसरा वर्ग द्विवेदी युग में सुदर्शन रचित राजपूत की हार, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट, रामनरेश त्रिपाठी कृत स्वप्नों के चित्र, उग्र कृत चार बेचारे एवं अफजल वध एकांकियों से इस परम्परा को मानते है। आधुनिक एकांकी के तत्वों (संकलनत्रय लक्ष्य की एकनिष्ठता, अन्तर्द्वन्द आदि) की दृष्टि से ये एकांकी एकदम शिथिल है। अतः इन्हें भी हिन्दी एकांकी का जनक नहीं मान सकते हैं।

Ekanki Natak Ke Udbhav Aur Vikas Par Prakash

विद्वानों का चौथा वर्ग सन् 1929 में प्रसाद कृत एकांकी ‘एक घूँट” को हिन्दी का प्रथम एकांकी मानता है। ‘एक घूँटों वस्तुतः आधुनिक एकांकी नाटक के बहुत निकट दिखाई देता है।

विद्वानों का पांचवां वर्ग सन् 1930 में डा0 रामकुमार वर्मा कृत ‘एकांकी ‘बादल की मृत्यु’ को हिन्दी का प्रथम एकांकी मानता है। यह नाटक मैटरलिंक की शैली पर रचित हैं। यह पाश्चात्य शैली का एक भावात्मक रूप है। जब कि प्रसाद कृत ‘एक घूँट’ और बादल की मृत्यु को छोड़कर हमें इतने आगे जानें की कोई आवश्यकता नहीं है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते है कि हिन्दी का एकांकी पश्चिम के एकांकी के अनुकरण पर विकसित हुआ है, यह अंग्रेजी साहित्य की देन है तथा हिन्दी के आधुनिक एकांकी की परम्परा सन् 1930 में डा रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित एकांकी ‘बादल की मृत्यु’ से आरम्भ होती है। इसके उपरान्त आधुनिक एकांकी लेखन को सन् 1938 में प्रकाशित ‘हस’ के एकांकी अंक से वास्तविक मार्गदर्शन एवं दिशा-बोध प्राप्त । अंक में प्रथम बार श्रेष्ठ लेखकों के उत्तम एकांकी नाटक एक साथ प्रकाशित हुए थे और एकांकी नाटक से सम्बन्धित उच्चस्तरीय समालोचनाएं सामने आई। विकास क्रम की दृष्टि से हिन्दी के एकांकी नाटक साहित्य का काल विभाजन हम निम्नलिखित प्रकार से करते हैं।

प्रथम विकास युग / भारतेंदु युग (सन 1870 से 1905)

गद्य की अन्य विधाओं के समान इस युग में भी हमें एकांकी नाटक का प्रारम्भिक रूप में दिखाई पड़ता है। इस युग के एकांकियों मैं राष्ट्रीय नव चेतना स्वर मुखर है समाज में सुधार की भावना प्रबल है। इस युग के प्रमुख एकांकीकार है- प्रतापनारायण मिश्र, काशीनाथ खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी तथा बालकृष्ण भट्ट मौलिक एकांकियों के अतिरिक्त इस युग में संस्कृत, बंगला तथा अंग्रेजी से अनूदित एकांकी भी प्रस्तुत किये गये।इस युग के लेखकों में यथार्थ रूप से नवीन विचार थे, तथापि प्राचीनता के प्रति इनका आग्रह बराबर बना रहा। इस युग से एकांकी नाटककारों ने अधिकांशत: ‘प्रहसन’ विधा को अपनाया।

द्वितीय विकास युग / द्विवेदी युग (सन् 1906 से 1924)

यह युग राजनीतिक चेतना और सामाजिक समस्याओं का युग था । इस युग में सांस्कृतिक पुनरुत्थान का आन्दोलन जोरों पर था। इस युग में विषय-वस्तु की दृष्टि से चार प्रकार के एकांकी नाटक लिखे गये 1. सामाजिक एवं व्यंग्यात्मक। 2. राष्ट्रीय एवं ऐतिहासिक 3. धार्मिक तथा पौराणिक 4. अनूदित इस युग में अधिकांशतः व्यंग्य एवं प्रहसन की शैली अपनाई गई। टैक्नीक की दृष्टि से इस युग के नाटक पारसों विवेंट्रिकल कम्पनियों से अधिक प्रभावित है। इस युग के एकांकीकारों के नाम है-राधेश्याम कथावाचक, जी०पी० श्रीवास्तव रूपनारायण, पाण्डेय, जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन पाण्डेय, बेचनशर्मा, ‘उग्र’ रामनरेश त्रिपाठी, बद्रीनाथ भट्ट, सियाराम, शरण गुप्त।

तृतीय विकास युग (सन् 1925 से 1938)

इस युग में जयशंकर प्रसाद ने सर्वप्रथम अपना एकमात्र मौलिक एकांकी’ एक घूँट’ लिखा है। इसी युग में सन् 1930 में डा0 रामकुमार वर्मा ने हिन्दी का सर्वमान्य प्रथम एकांकी ‘बादल की मृत्यु’ लिखा। इस दृष्टि से यह युग हिन्दी एकांकी नाटक के उद्भव एवं विकास का युग है। इस युग के एकांकियों को स्थल रूप से तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(क) वे एकांकी जो विदेशी प्रभाव से अछूते थे, इनके कथानक प्राय: ऐतिहासिक थे। इस वर्ग के प्रमुख एकांकीकार है-गोविन्दवल्लभ पन्त, चतुरसेन शास्त्री, डा० सत्येन्द्र तथा वृन्दावनलाल वर्मा।

(ख) वे एकांकी जो पाश्चात्य प्रभाव में पूरी तरह रंगे हुए। थे और उनके लेखकों का जीवन-दर्शन ही पाश्चात्य रंग में रंग गया इस वर्ग के प्रमुख एकांकीकार है- भुवनेश्वरप्रसाद, धर्मप्रकाश आनन्द तथा गणेश प्रसाद द्विवेदी ।

(ग) वे एकांकी जिनकी टैक्नीक पाश्चात्य है, परन्तु विचारों, दर्शन आदि पर भारतीयता का रंग है इस वर्ग के प्रमुख एकांकीकार है- डा0 रामकुमार वर्मा, सेठ गोविन्द दास, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्, लक्ष्मी नारायण मिश्र, विष्णुप्रभाकर तथा भगवती चरण वर्मा इस वर्ग के एकांकियों में प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारधाराओं तथा मान्यताओं का सुखद समन्वय है।

चतुर्थ विकास युग (सन् 1939 से अब तक)

इसे हम वर्तमान युग कह सकते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् की विशिष्ट परिस्थितियों ने तथा भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त जनवादी भावनाओं ने जनजीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। फलस्वरूप एकांकी नाटकों ने इस युग में खूब उन्नति की है। यह एक प्रकार से लोक-रंजन एवं लोक शिक्षण का माध्यम बन गया है। हिन्दी के नाट्य संसार में एकांकी नाटक छा गये हैं। पन्त, चिरंजीत तथा गिरिजाकुमार माथुर ने गीत तथा अभिनय के संयोग द्वारा एकांकियों की रचना करके हिन्दी के एकांकी नाटक साहित्य को एक नवीन आयाम प्रदान किया है।

रेडियों तथा टेलीविजन ने एकांकी को और भी लोकप्रिय बनाया है 1 नवीन शिल्प के द्वारा हिन्दी के एकांकी को विकसित करने वाले प्रमुख एकांकीकार है-डॉ० रामकुमार वर्मा, भुवनेश्वर, उदयशंकर भट्ट, सेठ गोविन्ददास, जगदीश चन्द्र माथुर, उपेन्द्रनाथ अश्क, विष्णु प्रभाकर रांगेय राघव, प्रभाकर माचवें, डा० लक्ष्मी नारायण लाल, लक्ष्मी नारायण मिश्र, धर्मवीर भारती, अज्ञेय, हरिकृष्ण प्रेमी, अमृत लाल नागर, भारत भूषण अग्रवाल, सद्गुरुशरण अवस्थी, वृन्दावन लाल वर्मा आदि कई महिलाएं एकांकीकार भी उभर कर आयी- श्रीमती विमला लूथरा, श्रीमती विमला रैना, सूर्यकुमारी, हीरादेवी चतुर्वेदी आदि ।

उपसंहार

वर्तमान युग में इस विधा ने आशातीत उन्नति की है। एकांकियों में यथार्थवाद का पुट रहता है तथा इसमें अधिकांश में अवचेतन मन की दमित यौन वासना की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। टैक्नीक के ऊपर सिनेमा तथा पाश्चात्य नाटक-साहित्य का गहरा प्रभाव रहता है। एकांकियों में संगीत एवं स्वगत कथन का बहुत कम प्रयोग किया जानें लगा है। आज ऐसे एकांकी अधिक लिखे जाते हैं जिनमें नारी पात्रों की संख्या कम होती है।

विषय-वस्तु, टैक्नीक, अभिव्यंजना शैली, उद्देश्य आदि के आधार पर एकांकियों के अनेक वर्ग किये गये हैं । कुछ महत्वपूर्ण वर्ग इस प्रकार हैं-आलोचक एकांकी, समस्यात्मक एकांकी, व्याख्यामूलक एकांकी, प्रगतिवादी एकांकी, आदर्श मूलक एकांकी पौराणिक एकांकी, ऐतिहासिक एकांकी, राजनीतिक एकांकी, सामाजिक एकांकी मनोवैज्ञानिक एकांकी, दार्शनिक एकांकी, आंचलिक एकांकी, व्यंग्यात्मक एकांकी, गीतात्मक एकांकी, प्रतीकात्मक एकांकी, रंगमंचीय एकांकी, एकमंचीय एकांकी, स्किट फैटेसी, छायाभिनय एकांकी, एकांकी ओपेरा, झांकी आदि ।

इस युग में रेडियो एकांकी विशेष लोकप्रिय हुए हैं। इनमें संवाद तत्व की प्रधानता रहती है। इनमें पात्रों की संख्या कम रहती है। अधिकांश कार्य ध्वनि प्रभावों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। अब टेलीविजन पर भी एकांकी प्रस्तुत किये जाने लगे हैं। एकांकी को अभिनीत करनें में साधनों और समय की आवश्यकता कम रहती है।इस कारण इसकी रचना और रंगमंचीय प्रस्तुतीकरण अधिक लोकप्रिय हो गये है। इससे बड़े नाटकों की रचना में बाधा उपस्थित हुई है।

हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय एकांकीकार ये है

डा0 राम कुमार वर्मा, लक्ष्मी नारायण मिश्र, गिरिजाकुमार माथुर, जगदीश चन्द्र माथुर, सेठ गोविन्ददास, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, विष्णु प्रभाकर, उदयशंकर भट्ट भुवनेश्वर मिश्र, विनोद रस्तोगी, डा० लक्ष्मीनारायण लाल, शशीप्रभा, विमला लूथरा, तथा शची रानी गुंटू।

इससे सम्बंधित लेख: एकांकी के स्वरूप, परिभाषा एवं तत्वों का विवेचन

Leave a Comment