[Class10] अग्रपूजा खण्डकाव्य का कथासार | Agrapooja Khandkavya Ka Kathasar

Amazon और Flipkart पर गारंटीड 50% से 60% तक की छुट पाने के लिए हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़े। ​

अग्रपूजा खण्डकाव्य का कथासार: ‘आज की इस लेख में आप सभी का स्वागत हैं| आज की इस लेख में आप सभी को हम अग्रपूजा खण्डकाव्य का कथासार देने वाले है| तो आइये आज की इस लेख की शुरुवात करते हैं| और जानते हैं की इस कथासार को कैसे लिखा जा सकता हैं|

अग्रपूजा खण्डकाव्य का कथासार

अग्रपूजा की कथावस्तु महाभारत तथा भागवतपुराण से ली गई है। इसके लेखक पण्डित रामबहोरी शुक्ल जी हैं। पाण्डवों के विरुद्ध दुर्योधन के द्वारा रचे गए अनेक षड्यन्त्रों में से एक लाक्षागृह का निर्माण भी किया गया था। पाण्डव इन षड्यन्त्रों से बचते हुए ब्राह्मण रूप में द्रौपदी के स्वयंवर सभा में उपस्थित हुए जहाँ अर्जुन ने मत्स्य भेदन करके शर्तानुसार द्रौपदी को प्राप्त किया तथा वहाँ उपस्थित अन्य आक्रमणकारियों एवं राजाओं को परास्त किया। व्यास और कुन्ती के कहने पर द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी बनी। पाण्डवों की इस सफलता पर दुर्योधन ने उनके विनाश की बात सोची, किन्तु भीष्म, द्रोण और विदुर की सम्मति से पाण्डवों को धृतराष्ट्र ने आधा राज्य देने का निर्णय किया।

दुर्योधन आदि के विरोध करने पर भी उन्होंने युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया, युधिष्ठिर अपने भाइयों, माता और पत्नी के साथ ‘खाण्डव’ वन गए, जिसे विश्वकर्मा ने कृष्ण के आदेश से स्वर्गलोक के समान बना दिया तथा उसका नाम ‘इन्द्रप्रस्थ’ रखा गया। धर्मराज कुशलतापूर्वक राज्य कार्य करने लगे। नारद के कहने पर स्त्री विवाद न हो, इसलिए पाण्डव बारी-बारी से एक वर्ष तक द्रौपदी के साथ रहने लगे। इस नियम को भंग करने के फलस्वरूप 12 वर्ष का वनवास अर्जुन को मिला।

वनवास की अवधि में भ्रमण करते हुए द्वारका में अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया तथा कृष्ण और सुभद्रा के साथ इन्द्रप्रस्थ लौटे। अग्निदेव के भोजन हेतु ‘खाण्डव’ वन का दाह करने पर अग्निदेव ने अर्जुन को कपिध्वज रथ तथा वरुण ने गाण्डीव धनुष दिया। अग्निदेव ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र तथा कौमुदी गदा दिए। खाण्डव-वन- दाह के समय ‘मय’ की रक्षा करने पर मय ने अर्जुन को देवदत्त नामक शंख और भीम को भारी गदा प्रदान किया तथा श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर के लिए सुन्दर-सा सभा भवन का निर्माण किया।

युधिष्ठिर की प्रसिद्धि एक अच्छे राजा के रूप में तीनों लोकों में फैल गई। तब पाण्डु ने नारद से उन्हें सन्देश दिया कि वे राजसूय यज्ञ करें, जिससे वे पितृलोक में रह सकें तथा बाद में स्वर्ग में प्रवेश पा सकें। श्रीकृष्ण ने राजसूय यज्ञ करने के पूर्व सम्राट पद पाने के लिए जरासन्ध वध करने की सलाह दी। ब्राह्मण के वेश में कृष्ण, अर्जुन और भीम जरासन्ध के पास पहुँचे तथा मल्लयुद्ध में चतुराई से दोनों टाँगों को चीरते हुए उसे मार डाला तथा जरासन्ध के द्वारा बन्दी किए गए हजारों राजाओं को मुक्त किया।

युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को चारों दिशाओं में सैन्य बल बढ़ाने के लिए भेजा। उनके प्रयास से सभी राजाओं ने उनकी अधीनता स्वीकार की तथा युधिष्ठिर के ध्वज के नीचे आ गए। इसके बाद राजसूय यज्ञ की तैयारियाँ होने लगीं। इसके लिए चारों दिशाओं में राजाओं को निमन्त्रण भेजा गया। अर्जुन द्वारका गए और भीम द्रुपद को लाने तथा नकुल कौरवों को आमन्त्रित करने गए।

निमन्त्रण पाकर सभी लोग आए तथा सबको उचित जगह पर ठहराया गया। इस यज्ञ में देवता एवं असुर भी आए थे। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यज्ञ को सफलतापूर्वक सम्पन्न करवाने की प्रार्थना की। इसलिए श्रीकृष्ण सम्पूर्ण सेना के साथ इन्द्रप्रस्थ आए। सभी नर-नारियों ने श्रीकृष्ण के दर्शन किए और अपने को धन्य माना। युधिष्ठिर, कृष्ण के रथ के सारथी बने तथा इन्द्रप्रस्थ में कृष्ण और उनके साथ आए हुए सभी लोगों का यथोचित स्वागत हुआ, जिससे कृष्ण से द्वेष रखने वाले रुक्मी और शिशुपाल बेचैन हो गए।

राजसूय यज्ञ में कार्य को अच्छी तरह से सम्पादित करने के लिए युधिष्ठिर ने अपने सभी सम्बन्धियों की उम्र एवं योग्यता को ध्यान में रखकर काम बाँट दिए थे। श्रीकृष्ण ने भोजन परोसने एवं लोगों के पैर धोने के काम को स्वेच्छा से चुना। सभी ने अपना काम निष्ठापूर्वक किया। सभा वर्णों के प्रतिष्ठित व्यक्ति सभा में पधारे। जब श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि सभा में पधारे तो शिशुपाल को छोड़कर सभी उनके स्वागत में खड़े हो गए।

भीष्म के द्वारा उठाए गए अग्रपूजा के प्रश्न पर सबने कृष्ण के नाम पर सहमति दी। चेदिराज शिशुपाल ने इस पर आपत्ति की तथा उनकी निन्दा की और अपमान भी किया। भीष्म आदि ने शिशुपाल को रोका। सहदेव ने शिशुपाल को धमकाया तथा श्रीकृष्ण को अर्घ्य दिया। श्रीकृष्ण को मारने के लिए दौड़ते हुए शिशुपाल को चारों ओर कृष्ण ही दिखाई देने लगते हैं।

शिशुपाल को कृष्ण ने समझाया कि उन्होंने श्रुतश्रवा बुआ को उसके सौ अपराध को क्षमा करने का वचन दिया है। इसलिए वे मौन हैं, मौन को दुर्बलता न मानकर वह अनुचित व्यवहार न करे, किन्तु शिशुपाल न माना। सौ वचन पूरा होते ही कृष्ण ने शिशुपाल को बचने की चेतावनी देते हुए उस पर सुदर्शन चक्र चला दिया, जिससे उसका सिर, धड़ से अलग हो गया।

विधिपूर्वक चलते हुए राजसूय यज्ञ को व्यास धौम्य आदि सोलह ऋषियों ने विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न किया। धर्मराज ने विद्वानों, ब्राह्मणों, राजाओं तथा अन्य अतिथियों का उचित सत्कार किया तथा सम्मानपूर्वक उन्हें विदा किया तथा श्रीकृष्ण और बलराम के प्रति हृदय से आभार प्रकट किया, क्योंकि उनके बिना यज्ञ सुचारु रूप से सम्पन्न नहीं हो पाता।

Facebook
Twitter
WhatsApp
Telegram

Leave a Comment

Trending Post

Request For Post